‘नाटक’- भाग 2 – भोजपुरी कहानी – कुमार मुकेश

भाग 2- यह कहानी कुल 4 भागों में है

‘तू हमार कबो रहबे ना कइला कुमार, हम तोहरा से बस बतियावत रहीं आ हमरा ना पता रहे कि तू एह के ई नाम दे देब, हम के भूला जा’ , ‘हमके भूला जा…….!…!…’

दोएत के साथे दुपहिया अर्थात बाइक से आइल रहनी नाटक देखे, कार्यक्रम से घर के दूरी ढेर त ना बाकी 1 घंटा के रहे. हम पीछे बइठ गइनी आ गाड़ी चल पड़ल.

ठंड के शुरुआती मौसम में हल्का हल्का ठंढा पड़त रहे. ठंढ के असर मन पर भी होत रहे आ रात के दस बज गइल रहे.

कुमार.., का टाइम होत बा हो? दस बज गइल बा हो राजेश हम जवाब दिहनि. फिर, चल मरदे बियाह बइठ गइल होइ. आव , हइ परदा देखल छोड़ द चलल जाव बियाह देखल जाव! राजेश हमार बचपन क्व दोस्त रहल.

मनोरंजन के खातिर लगावल गइल परदा छोड़ हमने के भउजी के घर के तरफ बढ़ गइनी जा. बरियात लगहिं के बगीचा में टिकल रहे. ‘हम दोनों दो प्रेमी…..’ गीत के आवाज पर्दा के जरिये माइक से होके कान तक पहुंचत रहल.

खैर, बियाह बइठ गइल रहे. पहुंच के दुनो जन आपन आपन जगह लेके बइठ गइनी जा. बियाह के कार्यक्रम पंडित जी के मंत्रोचारण से दिव्य प्रतीत होत रहल. नज़र फेरू उठल आ उनकरा के देख के संतोष कर लिहलसि.

अब उहो कबो कबो हमरा के देख लेंस आ मुस्कुरा देत रहली. बियाह के कार्यक्रम हंसी मजाक के बाद बिधिवत संपन्न भइल. रात के 1-डेढ़ बज गइल रहे यानी तीन साढ़े तीन घंटा लाग गइल रहे.

एहिजा उनकरा से नज़र मिलला के बाद मन के रोंवा रोंवा हसीन हो गइल रहे. हम कवनो ग़ालिब ना रहनी ना त उनकरा हसीन जुल्फ,चेहरा,आंख,होठ आ कमर पर कुछ शेर जरूर लिख देले रहतीं.

सुबेर भइला में ढेर समय ना लागल,बिदाई के तइयारी शुरू हो गइल रहे, सब कोई जल्दी बिदाई चाहत रहे ताकि जल्दी से जल्दी घरे जाईल जा सके.

रोवन रपटन में हमरा नज़र ओह सूरत पर भी पड़ल जे सांझ ले हंस हंस के गीत गावत रहे उ बिदाई के बेरा मुरझा गइल रहे. बिदाई के दुख लईकी वाला से ज्यादा केहू ना समझ सके.

लेकिन मन बिदाई से ज्यादा ओह सूरत में अझुराइल रहे ,उनकरा देखे के एकहू मौका हम छोड़ें ना चाहत रहनी काहें से की कुछे देर में बिदाई जे होखे वाला रहे. बहत नयन अश्रु से सब कोई बिदाई कइल आ हमहन के घर कि तरफ चल दिहनि जा.

हमहन घरे पहुंच गइल रहनी जा, हमरा के फिर से झकझोरत राजेश हमरा के मोटरसाइकिल पर आए नीचे उतरे के कहलें, का हो कहाँ चल जात बाड़?,तबियत ठीक बा न आ जबसे नाटक देखले बाड़ तबसे कहाँ आ कवनि दुनिया मे भुला जात बाड़? बाइक से उतरत ही राजेश के सवाल हमरा तरफ आवे शूरु हो गइल.

हम शायद जवाब देबे के स्थिति में ना रहनी आ ना ही जवाब देके इच्छा रहे बाकि दू बेर अतीत में गइला के बाद मन कहीं ना कहीं अबहीनो नाटक आ हकीकत में अंतर समझे में लागल रहे लेकिन वर्तमान के चेतना हकीकत से दूर राखे मे. प्यार के मंदिर में दिल कुछ आउर गवाही देव जबकि मन रूपी दिमाग कही बढ़ गवाही देत रहे.

कुमार ,हाथ मुह धो के खाना खाए बइठ जा, राजेश हमरा के चाभी देके अपना घरे चल गईलें,दुनो जने के घर लगही लगही रहल, सड़क के एह पार हमर घर रहे जबकि ओह पार राजेश के घर रहे.

तौलिया से हाथ पोछत हम खाए बइठ गइनी , खाना बहुत निमन बनावत रहली भउजी,घर के अन्नपूर्णा रहली उ. पहिले रूखा सूखा के गुजारा होत रहे लेकिन भउजी के अइला से एह जीभ के नून मरीचा के स्वाद लाग गइल रहे.

राजेश बतावत रहले ह कि तहा तबियत ठीक नइखे,कुछ भइल बा का? भउजी हमरा पर प्रश्न करत थरिया उठावे लगली.

ना भउजी कुछो त ना भइल बा, उ ठंढा पड़त बा न,बहरी ठंढा लागत रहे एहि से राजेश के बुझाइल होइ. हम बात के सम्हारे के कोशिश करत उठी के अपना खटिया पर आ गइनी.

ई प्यार भी अजीब रोग होला जब होला त सगरो दुनिया के अपने उल्टा चश्मा से देखे के कोशिश करेला बाकि बुझे में असमर्थ होला कि दुनिया प्यार के चश्मा के साथे साथे अपने अलग अलग रंग के चश्मा से भी प्यार के निहारेले.

प्यार के देखला के सबकर आपन आपन नजरिया होला, केहू प्यार में भगवान के खोज लेला त केहू प्यार में विश्वास के, बस प्यार के डोर केतना मजबूत नेह के डोरी से बधाईल बा एह पर भी निर्भर करेला.

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भउजी के घरे अइले एक दिन हो गइल रहे,सब केहू हित मीत ,रिश्तेदार धीरे धीरे सब कोई अपना घरे जाए शुरू कर देले रहे. धीरे धीरे जवन घर शादी के माहौल में लोगन से भरल रहे उ अब धीरे धीरे खलिया गइल रहे.

घर मे माई, बाबूजी,भइया-भउजी आ सबकर दुलारी बहिन के अलावा अब केहूँ ना रही गइल रहे.

अपना मोबाइल से लिहल गइल बियाहे के तस्वीर देखते देखते नज़र उनकर फोटो पर पड़ल आ मन में उनकर तस्वीर अब बिना देखले छप गइल रहे.

अबले उनकर नाम भी ना पता रहे हमके,मन अलग अलग नाव रखे लागे, कबो कुछ त कबो कुछ. आखिर हिम्मत जुटा के हम भउजी से उनकरा बारे में पूछे के खातिर तैयार हो गइनी बाकि मन बेचैन भी रहे कि का होइ? कहीं भउजी खिसिया त ना जइहें.

भउजी के उनकरा कमरा में अकेला पाके हम घुस गइनी. हमरा के देखते उ उठ के खड़ा हो गइली. आप आईं ना,बइठी! हमरा ओर देखत भउजी पलंग की ओर इशारा कइली.

भउजी तोहरा के कुछ फोटो  देखावे के रहे ,केहू पहिचान में नइखे आवत? हम फोन भउजी के देत उनकरा लगे जा के खड़ा हो गइनी.

भउजी बारी बारी से फोटो देखत सबकरा बारे में बतावे लगली,हमरा इंतजार के घड़ी आखिर आ ही गइल.

ई आराधना हई, हमार छोट बहिन. भउजी उनकरा बारे में बतावे लगली, एहि साल बारहवीं के परीक्षा दिहली ह आ ई हमार बहिन ना बल्कि साँच दोस्त हई.

मन आज पहिली बार उनकर नाम जनले रहे,आराधना!जइसन नाम ओइसे ही उनकर रूप रहे. अपना नाम के चरितार्थ करत उनकर स्वरूप आराधना करे लायक ही रहे….

कहानी जारी रही भाग 3 में..