बढ़ती लापरवाही से उजड़ते लोग : शशि तिवारी

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लेख में व्यक्त विचार लेखिका का अपना है. भोजपुरी खोज.कॉम का इन विचारों के साथ सहमत होना आवश्यक नही है.
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सड़क किनारे लगे साईन बोर्ड को हम सभी ने देखे होंगे साथ ही उन पर लिखे वाक्य, सावधानी जैसे ‘‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’’ पढ़ते भी आए है लेकिन फिर भी दुर्घटनाएं तो घटती ही है आखिर क्यों? गहराई में इस तथ्य को देखे तो हम पाते है कि जब हम अति विश्वास में होते है तब या सूचना को नजर अंदाज कर तब परिणाम केवल दुःख और नुकसान के ही रूप में घटित होता है आखिर मर्जी हमारी है.

जीवन में यही सूत्र काम में आता है अभी हाल ही में पंजाब प्रदेश के अमृतसर में जोड़ा फाटक के पास स्थित एक छोटा सा ग्राउण्ड जिसमें विगत् 20 वर्षों से रावण दहन का कार्यक्रम आयोजित होता आ रहा है.

लेकिन इस वर्ष रावण दहन के कार्यक्रम में देखने वाले दर्शकों की अत्याधिक भीड़ थी अधिक भीड़ होने के कारण पास में ही कुछ ऊँचाई पर स्थित रेल्वे ट्रैक था जहाँ पर आसपास की जनता वहाँ रावण दहन को देखने के लिए खड़ी थी जैसा कि भारत में होता है मेरी मर्जी.

मैं चाहे जहाँ खड़ा होऊं, कई बार तो हम अपने त्योहारों अर्थात् सभी धर्म के लोग बीच सड़क का रोक ही करने लगते हैं। ये अलग बात है कई बार हम दुर्घटनाओं का शिकार होते है तो कभी-कभी अपने प्रियजन को खोते है.

अमृतसर के जोड़ा फाटक पर भी कुछ ऐसी ही घटना हुई, रावण के जलते ही तेज फटाकों की आवाज के चलते उसी समय एक तीव्र गति से आ रही है ट्रेन जालंधर अमृतसर डी.एम.यू. ट्रेन के हार्न की आवाज पटरी पर खड़े लोग सुन नहीं पाए और ट्रेन सभी को रोंदती हुई निलक गई, कुछ इधर-उधर भागे तो उसी वक्त अमृतसर-हावडा भी दूसरी दिशा से आ गई। इस तरह ‘‘डेथ ट्रेन’’ से लगभग 61 से अधिक लोग मृत्यु की आगोश में समा गए तो लगभग 150-200 घायल हो गए.

जैसा कि भारत में चलन है घटना के बाद तरह-तरह का विश्लेषण तरह-तरह की चीर-फाड़ राजनीतिक पार्टियों द्वारा की जाती है वह भी हमला जोर-शोर से शुरू है. आरोप-प्रत्यारोप पक्ष विपक्ष में जारी है। लोगों का कहना है कार्यक्रम की मुख्य अतिथि नवजोत कोर सिददू को तभी संभल जाना था जब आयोजकों ने कहां कि रेल्वे ट्रेन पर 500 तो क्या 5000 भी खड़े होकर देखने को तैयार हैं.

मुख्य अतिथि सिद्दू को मंच से अपील करना चाहिए थी कि ट्रेन पर न खड़े हो, वह ट्रेन के लिए रास्ता है आपके लिए नही.

यहां कुछ यक्ष प्रश्न उठते है मसलन क्या?

1. मेला आयोजन समिति ने स्थानीय प्रशासन से अनुमति ली थी।

2. क्या पुलिस विभाग को सूचित कर अनुमति ली थी क्योंकि मेले में जनता की भीड़ का होना स्वभाविक है।

3. क्या नगर निगम से आगजनी की स्थिति से निपटने के पर्याप्त इंतजामात किये गये थे।

4. चूंकि यह कार्यक्रम रेलवे के पास होता है तो क्या रेलवे विभाग एवं उसकी पुलिस को सूचित किया गया था?

5. रेलवे प्रशासन को स्वतः संज्ञान ले ट्रेन ड्रायवरों को क्यों हिदायत जारी नहीं की आज दशहरा पर होने वाले कार्यक्रमों में भीड़ को देखते हुए ट्रेन की स्पीड धीमी कर निकाला जाए.

6. रेलवे नियमों के इतर यदि रेलवे विभाग व्यवहारिक पक्ष अपनाता तो शायद इतनी मृत्यु नहीं होती।

अब राजनीतिक दल एक दूसरे पर न केवल जिम्मेदारी ढोलेंगे बल्कि सामने को घटिया एवं अपने को नीति का पुलिन्दा बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगे, वही स्थानीय प्रशासन और रेल प्रशासन भी अपने बचाव में तरह-तरह के तर्क देगा, हो सकता है रेल विभाग अपने एक्ट/नियमों का हवाला दे पल्ला ही झाड़ ले.

लेकिन, यह किसी को भी नहीं भूलना चाहिए कि हुई घटना बड़ी हृदय विदारक थी और अब नैतिक दायित्व भी बनता है. ये अलग बात है अब जैसा शासन में होता है जांच कमेटी बना हाल फिलहाल जनता का गुस्सा शांत करा जायें फिर ठण्डे बस्ते में डाल फिर एक नई घटना का इंतजार हो.

इस देश में सबसे बडी कमजोरी यही है कि सब चलता है कि नीति को छोड़ना होगा। यदि हम पहले से ही बिना राजनीतिक रसूक के सारी व्यवस्थाएं सभी जिम्मेदार एजेन्सी को सूचना दे तो शायद होने वाले बड़े हादसों को टाल सकते हैं एवं अपने नागरिकों को सही मायने में सरकारे सुरक्षा भी कर सकती है।.