कबो लिखा न सकल,तकदीर जिंदगी के – Kumar Mukesh

कुमार मुकेश, संपादक/इंजीनियर/लेखक भोजपुरी खोज.कॉम

कबो लिखा न सकल, तकदीर जिंदगी के
धुआं धुआं ही रह गइल,तस्वीर जिंदगी के

मन के आंगन में अब कहाँ, प्रेम बरिसेला
सूखा ही रह गइल, जमीन जिंदगी के

भरोसा राखीं,जान लगा दिहीं, आपन मनले जे होखब
तब का करब जब साथ ही ना दिही,नसीब जिंदगी के

जब सभका के जाए के ही बा, हम कइसे बाचब
चाहें केतनो लगा लीं, तहरीर जिंदगी के

सुख दुख, हमरा साथे, एके मड़ई में रहल,
हम ना कबो बन पवनी अमीर जिंदगी के

हाड़ मास के रावण रोज गल रहल बा, मर रहल बा
जब इंसानियत ना बचल,कबले रही ई सरीर जिंदगी के

नज़र नज़र के फेर ह शक्ति आ भाव में, रुक जाईं
सम्भल जाइ, काहें खिचेनि जंजीर जिंदगी के

मन मतलबी होखे सम्हर जा ‘मुकेश’
जे साँचल उहे बाँचल, इहे सांच ह अंतिम जिंदगी के